कोरिया

कोरिया की भौगोलिक स्थिति ऐतिहासिक महत्ता निश्चित भूभाग अवसर की समता संभाग बनाने के लिए एकदम उपयुक्त समाजसेवी संवर्त कुमार रूप

‏‏कोरिया: उपेक्षा का दंश और संभाग बनाने की अनिवार्य माँग

 

 

 

 

कोरिया/ छत्तीसगढ़ की विकास यात्रा में कोरिया जिला एक ऐसे ‘अनाथ’ की तरह खड़ा है, जिसके साथ प्रशासनिक और राजनीतिक विसंगतियों ने छल किया है। 28 मई 1998 का वह दिन, जब कोरिया एक स्वतंत्र जिला बना था, तब यहाँ के लोगों ने विकास की एक नई इबारत लिखने का सपना देखा था। लेकिन आज, लगभग तीन दशक बाद, कोरिया अपनी पुरानी विरासत को खंडहर में तब्दील होते और विकास की दौड़ में पिछड़ते देख रहा है। पिछले कुछ वर्षों में हुआ प्रशासनिक पुनर्गठन, जो विभाजन के नाम पर एक ‘तुगलकी फरमान’ जैसा था, कोरिया के लिए अभिशाप सिद्ध हुआ है,यह कहना है समाजसेवी साहित्यकार संवर्त कुमार रुद्र प्रसाद रूप का। उन्होंने कोरिया जिले सहित आस पास के जिलों को बेहतर सुविधा हेतु कोरिया को संभाग बनाने की मांग पुरजोर रखी है उन्होंने क्षेत्र की जनता से आव्हान किया है उन्होंने कहा कि “यदि कोरिया को संभाग बनाया जाता है, तो यह केवल बैकुंठपुर या कोरिया का विकास नहीं होगा, बल्कि यह उत्तर छत्तीसगढ़ की एक नई ‘इकोनॉमिक कैपिटल’ के रूप में उभरेगा जिससे आसपास के जिले लाभान्वित होंगे।

 

विभाजन का दुष्चक्र: कोरिया की कमर टूटी

भूपेश बघेल सरकार के कार्यकाल में हुआ प्रशासनिक पुनर्गठन विकासपरक और समान विभाजन कम असमान ज्यादा प्रतीत हुआ। पांच विकासखंडों वाले जिले को तोड़कर उसे केवल दो विकासखंडों (कोरिया और सोनहत) में समेट देना समझ के परे था। इस “असमान विभाजन” का दंश आज कोरिया का हर नागरिक झेल रहा है।

 

संसाधनों का दोहन और पलायन: प्रशासनिक पकड़ ढीली होने के कारण यहाँ निवेश की संभावनाएं खत्म हो गईं। रोजगार के अभाव में युवा पीढ़ी का पलायन अब एक त्रासदी बन चुका है।

राजस्व की भारी क्षति: जिले का क्षेत्रफल सिमटने से राजस्व के स्रोत घट गए। जिस जिले को कभी विकास के लिए जाना जाता था, आज वह अनुदानों पर आश्रित हो गया है।

 

अधिकारियों की उदासीनता: ‘छोटा जिला’ होने का ठप्पा लगाकर यहाँ अनुभवी अधिकारियों की नियुक्ति से कतराया जाता है। विकास की फाइलें केवल मेजों के बीच दम तोड़ती हैं।

 

बुनियादी ढांचे का विनाश: पुराने सिविल लाइन का खंडहर होना, कोर्ट तहसील कार्यालय,और ऐतिहासिक रामानुज क्लब सहित अन्य भवन,का जर्जर होना केवल भवनों का अंत नहीं, बल्कि उस गौरवशाली कोरिया की आत्मा का अंत है जो कभी एक समृद्ध रियासत हुआ करती थी।

 

व्यापारिक मंदी: प्रशासनिक गतिविधियों के कम होने से व्यापारिक रुझान समाप्त हो गया है। आज वैकुण्ठपुर जैसे प्रमुख केंद्रों पर सन्नाटा पसरा रहता है।

 

संभाग ही क्यों? बड़े शहरों के मॉडल से सीखें

जब हम बिलासपुर, रायपुर, दुर्ग या अंबिकापुर जैसे संभागों की ओर देखते हैं, तो पाते हैं कि ‘संभाग का दर्जा’ किसी भी क्षेत्र के भाग्य को कैसे बदल सकता है। एक संभाग बनने से वहां केवल नाम नहीं जुड़ता, बल्कि सुविधाओं का एक पूरा इकोसिस्टम (तंत्र) खड़ा हो जाता है।

 

संभागीय मुख्यालय की सुविधाएं: बड़े संभागों में ‘रेंज’ स्तर के प्रशासनिक कार्यालय (आईजी, कमिश्नर) होते हैं। इससे जिले के निर्णय लेने की शक्ति बढ़ती है और क्षेत्र की समस्याओं का निराकरण स्थानीय स्तर पर ही संभव हो जाता है।

 

शिक्षा और स्वास्थ्य का हब: संभाग बनने पर यहाँ सरकारी मेडिकल कॉलेज, बड़े इंजीनियरिंग संस्थान और अत्याधुनिक सुपर-स्पेशलिटी अस्पतालों की स्थापना अनिवार्य हो जाती है, जो वर्तमान में कोरिया के लोगों के लिए दूर की कौड़ी हैं।

 

 

औद्योगिक निवेश और रोजगार: बड़े संभागों में ‘इंडस्ट्रियल कॉरिडोर’ बनते हैं। जब संभाग मुख्यालय बनता है, तो बड़े कॉर्पोरेट घरानों का रुझान बढ़ता है, जिससे स्थानीय युवाओं को रोजगार मिलता है।

 

विरासत का संरक्षण और पर्यटन: संभाग के बजट का एक बड़ा हिस्सा शहर के सौंदर्यीकरण और पुरानी धरोहरों को ‘हेरिटेज’ के रूप में विकसित करने में खर्च किया जाता है। संभाग बनने से कोरिया की पुरानी इमारतें फिर से गर्व के साथ खड़ी हो सकती हैं।

 

हमारा संकल्प: कोरिया को संभाग बनाने की माँग

कोरिया के पास प्राकृतिक संसाधनों की कमी नहीं है, भू भाग की नहीं है,कमी है तो केवल ‘प्रशासनिक इच्छाशक्ति’ की। कोरिया की भौगोलिक स्थिति और उसकी ऐतिहासिक महत्ता इसे संभाग बनने के लिए सबसे उपयुक्त बनाती है।

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