डस्टबिन में मिले फटे पन्ने ने दिखाई आत्मनिर्भरता की राह चार हजार रुपये के मानदेय से शुरू हुआ सफर, 30 लाख के उद्यम तक पहुंचीं अंजना उरांव


बैकुंठपुर, 1 अक्टूबर। कभी-कभी जिंदगी बदलने के लिए बड़े अवसर नहीं, बल्कि एक छोटी-सी जानकारी ही काफी होती है। कोरिया जिले के बैकुंठपुर विकासखंड के ग्राम तोलगा की अंजना उरांव के जीवन में बदलाव भी ऐसे ही एक फटे हुए कागज के पन्ने से आया। कार्यालय के डस्टबिन में पड़े उस पन्ने पर प्रधानमंत्री रोजगार सृजन कार्यक्रम की जानकारी थी। अंजना ने पन्ने को पढ़ा और इसे अपने जीवन की नई दिशा बनाने का फैसला किया।
स्नातकोत्तर शिक्षित अंजना उस समय जनपद पंचायत खड़गवां में अंशकालिक डाटा एंट्री ऑपरेटर के रूप में महज चार हजार रुपये मासिक मानदेय पर कार्यरत थीं। परिवार और बच्चों की जिम्मेदारियों के बीच सीमित आय में जीवन चल रहा था। योजना की जानकारी लेने के बाद उन्होंने जिला उद्योग केंद्र से संपर्क किया और पोड़ी-बचरा क्षेत्र में संचालित फ्लाईऐश ईंट निर्माण इकाई का निरीक्षण किया। यहीं से उन्होंने अपना उद्योग शुरू करने का निर्णय लिया।
उद्यम स्थापित करने की राह आसान नहीं थी। दस्तावेजी प्रक्रिया, बैंक से ऋण और अन्य औपचारिकताओं के दौरान कई अड़चनें आईं। परिवार और समाज के कुछ लोगों ने भी उन्हें पीछे हटने की सलाह दी, लेकिन अंजना ने हिम्मत नहीं छोड़ी। इस दौरान उनके पति अनिल कुमार ने भी उनका पूरा साथ दिया।
आखिरकार बैकुंठपुर स्थित एचडीएफसी बैंक से करीब 30 लाख रुपये का ऋण स्वीकृत हुआ। कटघोरा से मशीनें मंगाई गईं और शेड का निर्माण कराया गया। अगस्त 2025 में अंजना की फ्लाईऐश ईंट निर्माण इकाई का लोकार्पण हुआ तथा अक्टूबर 2025 से उत्पादन शुरू किया गया।
आज अंजना अपनी ‘अंजना इंटरप्राइजेज’ के माध्यम से करीब 20 लाख फ्लाईऐश ईंटों का उत्पादन कर चुकी हैं। उनकी इकाई की प्रतिदिन लगभग 15 हजार ईंटों की उत्पादन क्षमता है। प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत गांवों में बन रहे पक्के मकानों के लिए उनकी ईंटों की आपूर्ति की जा रही है। बारिश के कारण जुलाई से उत्पादन फिलहाल बंद है, जिसे मौसम अनुकूल होने पर दोबारा शुरू करने की तैयारी है।
अंजना के अनुसार, उनकी इकाई से प्रतिमाह करीब 6 से 7 लाख रुपये का कारोबार हुआ है। वहीं बैंक से लिए गए ऋण की करीब 60 हजार रुपये मासिक किस्त वे नियमित रूप से चुका रही हैं। उद्योग के साथ वे करीब चार एकड़ भूमि पर खेती और परिवार की जिम्मेदारियां भी संभाल रही हैं।
अंजना कहती हैं कि जिस डस्टबिन को लोग कचरे के लिए देखते हैं, उसी डस्टबिन में मिले एक पन्ने ने उन्हें उनकी पहचान दी। उनका संदेश है कि महिलाओं को सरकारी योजनाओं की जानकारी लेकर स्वरोजगार और उद्यमिता की दिशा में आगे बढ़ना चाहिए। मेहनत, लगन और हौसले से मुश्किल रास्तों को भी पार किया जा सकता है।
कलेक्टर रोक्तिमा यादव ने अंजना उरांव की सफलता को प्रेरणादायी बताते हुए कहा कि वे उन महिलाओं के लिए प्रेरणास्रोत हैं, जो संसाधनों की कमी के कारण आगे बढ़ने से रुक जाती हैं। उन्होंने कहा कि सरकारी योजनाओं का लाभ लेकर महिलाएं आत्मनिर्भरता की दिशा में आगे बढ़ सकती हैं।
- अंजना उरांव की कहानी इस बात की मिसाल है कि अवसर छोटा हो सकता है, लेकिन हौसला बड़ा हो तो सफलता की राह बनाई जा सकती है। कभी डस्टबिन में पड़ा एक फटा पन्ना आज उनके उद्यम की पहचान बन चुका है और उनकी बनाई ईंटें दूसरे परिवारों के पक्के घरों की नींव और दीवारों का हिस्सा बन रही हैं।




